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एक साथ क्यों नहीं कराए जाते सभी चुनाव

– मुकेश तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)

क्या निरंतर चुनाव का होना ठीक है ! हर वक्त चुनाव होने से प्रदेशों में विकास कार्य प्रभावित होते हैं। हैरानी की बात है कि कभी लोकसभा चुनाव तो कभी विधानसभा चुनाव। यदि यह चुनाव नहीं तो नगर निगम, नगर पालिकाओं के चुनाव उससे निपटे तो पंचायत या फिर मंडी के चुनाव हो रहे होते हैं यानी हमेशा चुनावी माहौल यह कड़वा सच है कि प्रदेशों में थोड़े थोड़े अंतराल के पश्चात चुनाव होने से आचार संहिता लगी रहती है आचार संहिता लगी रहने से नीतिगत काम महीनों तक लंबित पड़े रहते हैं सड़क पानी बिजली जैसी समस्याएं भी अधर में लटकी रहती है ।
लोग पीने के पानी की समस्याओं से जूझ रहे होते हैं लेकिन सरकारी मशीनरी और राजनेता यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हम आप लोगों की नाराजगी झेल लेंगे लेकिन चुनाव आयोग की फटकार नहीं झेल पाएंगे ।
सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री, मंत्री भी क्या करें जब चुनाव के दौरान शासकीय अफसरों का शिष्टाचार वश त्यौहार के मौके पर उनसे मिलना भी चुनाव आयोग को खटकता है अतः जनसामान्य की खातिर अधिकारियों से काम की बात करना तो दूर की बात है इस लाचारी का प्रभाव प्रदेश की सरकारों और मुख्य मंत्रियों की छवि पर भी पड़ता है लिहाजा मुख्यमंत्रियों की ओर से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की मांग उठ रही है इस बारे में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ज्यादा ही मुखर हैं ।
गौरतलब बात है कि बार-बार चुनाव से मुख्यमंत्रियों को चौतरफा संकट से पार पाने के लिए चुनाव के मौके पर ताबड़तोड़ लोकलुभावन घोषणाएं करने के साथ ही अपनी कुर्सी बरकरार रखने के लिए पूरी दम खम लगाना पड़ती है तो इससे बखूबी समझा जा सकता है कि चुनाव के पश्चात मुख्यमंत्री विकास में कितनी दिलचस्पी लेगा असलियत यह है कि जन विकास के लिए उसे पर्याप्त वक्त ही नहीं मिलेगा । तो वह क्यों चाहेगा कि विकास चुनाव का मुद्दा बने । चुनाव जीतने के लिए वह भी खुल्लम खुल्ला हर तरह का हथकंडा अपनाएगा ।
यह हथकंडा धार्मिक भावनाओं का उभार भी हो सकता है जातिगत उभार भी हो सकता है और चुनाव में मददगार रहने वाले अपराधीतत्वों को संरक्षण देना भी हो सकता है । सच्चाई तो यह है कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा के चुनाव पहले साथ-साथ ही हुआ करते थे 15वें लोकसभा चुनाव के साथ उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए थे हकीकत यह है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होंगे तो चुनावी खर्च बचेगा साथ इसको संपन्न कराने के लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ेगी सिर्फ मतदान केंद्र पर दो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन रखना होगी ।
एक में लोकसभा के उम्मीदवारों के नाम व चिन्ह होंगे और दूसरी में विधानसभा उम्मीदवारों के । लेकिन सभी चुनाव एक साथ कराने में समस्या यह आ रही है कि सभी प्रदेशों की विधानसभाओं का कार्यकाल एक साथ पूर्ण नहीं होता लिहाजा ऐसी स्थिति में लोकसभा चुनाव के साथ सभी विधानसभाओं के चुनाव  कराना संभव नहीं है।
मगर एक साथ चुनाव करने के पक्ष में मुखर हुए राजनेताओं का कहना  है कि जिन प्रदेशों  में विधानसभाओं  का कार्यकाल कुछ महीने का शेष रह गया हो उन प्रदेशों के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराने की परपाठी शुरु कर देना चाहिए। जहां तक नगर पालिकाओं  और पंचायतों के चुनाव की बात है उनको तो एक साथ कराया ही जा सकता है क्योंकि इनमें कार्यकाल संबंधी  वैसी अड़चन नहीं आती जैसी लोकसभा और विधानसभा चुनाव को लेकर आती है।
बहरहाल लोकसभा,  विधानसभा, नगरपालिका, व पंचायत चुनाव एक साथ हो सकेंगे या नहीं यह तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन लगातार चुनाव की वजह से विकास कार्य प्रभावित ना हो इसके लिए तो आमसहमति  बनाई जा सकती है। चुनाव अपनी जगह है लेकिन सरकारी मशीनरी को जनसामान्य के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को इस दौरान नहीं भूलना चाहिए ।

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