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श्री मुकेश तिवारी(वरिष्ठ पत्रकार) की कलम से

ग्वालियर मेला, विकास यात्रा के 113 वर्ष

ग्वालियर मुकेश तिवारी  बीते 40 साल से ग्वालियर मेले को देख रहा हूं । 113 साल का यह बूढ़ा मेला हर साल जवान होता जा रहा है ।इसका  नित नयापन कभी पुराना नहीं होता । उसकी सुंदर व्यवस्था से आकर्षित होता रहा हूं । अष्टकोण सेक्टरों में विभाजित दुकानों के बीच  के सभी चौराहे छतरियां चबूतरे  ग्वालियर मेले में पक्की और अस्थाई दुकानों की व्यवस्था बिजली और पानी का सुंदर प्रबंध फ्लैश के स्थाई शौचालय तथा  मूत्रालय पक्की सड़कों सहित मेले के दोनों तरफ सेंड स्टोन से बने आधा दर्जन कलात्मक दरवाजे आदि कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो देश के अन्य मेलों में देखने को नहीं मिलती । इन विशेषताओं के कारण ग्वालियर मेले में कहीं भी गंदगी नहीं होती, और व्यापारियों अथवा मेला घूमने आए सैलानियों को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती ।

हमारे देश में मेलों की परंपरा बहुत पुरानी है मेले हमारे धार्मिक और आर्थिक जीवन के अंग बन गए हैं ।मेलों की शुरुआत कब हुई यह निश्चित रूप से बताना मुश्किल है ।तथापि हम यह जानते हैं कि हमारे देश में सबसे पुराने मेले कुंभ तथा अन्य धार्मिक पर्वों के अवसर पर लगने वाले मेले हैं । कुंभ की मान्यता हजारों वर्ष पुरानी है। कुंभ का मेला समुद्र मंथन की  किवदंती से जुड़ा हुआ है । समुद्र मंथन हकीकत में कभी हुआ होगा यह कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता शिवाय पंडों और पुरोहितों के किंतु प्राचीन काल के मेलों का उद्देश्य बहुत कर धार्मिक होता था  उनका व्यवसायिक पहलू गौड होता था । कुंभ का मेला तथा सूर्य ग्रहण के मौके पर तीर्थों में आयोजित होने वाले यथा कुरुक्षेत्र का मेला त्रिवेणी प्रयाग का मेला इसके उदाहरण हैं ।

किंतु इन धार्मिक मेलों में भी जब लाखों लोग एकत्र होने लगे तो उनकी अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वहां व्यवसायियों की भी उपस्थिति आवश्यक होने लगी, फिर व्यवसायियों और और निर्माताओं ने सोचा कि अपना माल बेचने के लिए इन लाखों लोगों की उपस्थिति का लाभ क्यों नहीं उठाया जाए ,अतः व्यापारी और निर्माता अपना माल बेचने के लिए इन मेलों में जमा होने लगे तथा तीर्थ यात्री भी अपनी आवश्यकता अनुसार इन वस्तुओं को खरीदने लगे तथा मेले आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने लगे । यदि हम व्यापारिक मेलों के इतिहास का अध्ययन करें तो हम यह पाते हैं कि जब मुद्रा का प्रचलन नहीं हुआ था। तब आज के अर्थ में व्यापार का अस्तित्व ही नहीं था ,आज का व्यापार बिचौलियों द्वारा चलाया जाता है तथा यह मुद्रा पर ही आधारित है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु या सेवा का  मूल्य मुद्रा में ही निश्चित किया जाता है। जब मुद्रा का जन्म नहीं हुआ था । तब व्यापारी नहीं थे अतः वस्तुओं के उत्पादक किसी महत्वपूर्ण और सुविधाजनक स्थान पर अपने उत्पादन ओं के साथ एकत्र होते थे और अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का विनिमय कर लेते थे । तथा किसान अपना अनाज देकर कपड़ा बुनने वालों से कपड़ा खरीद लेता था और जूता  बनाने वाले  से जूता खरीद लेता था ।इस विनिमय के फल स्वरुप कपड़ा बुनने वाले और जूता बनाने वाले की अनाज की आवश्यकता पूरी हो जाती थी। हमारे देश में साप्ताहिक हाटओ का जन्म भी इसी प्रकार हुआ। यह साप्ताहिक हाट अभी भी कहीं-कहीं लगती हैं । मेला हमारे देश और प्रदेश में लगने वाली साप्ताहिक हाटओ के ही विकसित बृहद रूप है । प्राचीन काल में हमारी अर्थव्यवस्था भिन्न थी अतः मेलो और हाटो का स्वरूप भी भिन्न था जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है हमारे देश में मेलो का जन्म मुख्यतः धार्मिक कारणों से हुआ किंतु धीरे-धीरे यह मेले व्यवसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनते गए उदाहरण के लिए हम अपने पड़ोसी आगरा जिले में लगने वाले बटेश्वर के मेले को ले यह कार्तिक पूर्णिमा पर यमुना स्नान की दृष्टि से प्रारंभ हुआ किंतु बाद में एक व्यवसायिक मेले के रूप में विकसित हो गया ।पशुओं की बिक्री की दृष्टि से तो यह उत्तर भारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मेला बन गया है। अप्रैल मास में भिंड जिले के मेघपुरा का मेला लगता है यह भी पशु मेला ही है ग्वालियर मेले का प्रारंभ भी पशु मेले से ही हुआ था ।ग्वालियर का मेला

अब हम मुख्यतः ग्वालियर मेले की चर्चा करें ग्वालियर  का मेला शुद्ध आर्थिक मेला है  इसकी शुरुआत भूतपूर्व ग्वालियर रियासत को आर्थिक दृष्टि से विकसित करने के लिए की गई थी भूतपूर्व राज्य के आर्थिक विकास का बीड़ा सर्वप्रथम स्वर्गीय महाराज माधवराव सिंधिया ने उठाया था उन्होंने इस तथ्य को समझा कि जब तक औद्योगिक और व्यावसायिक दृष्टि से ग्वालियर राज्य का विकास नहीं होगा तब तक यह क्षेत्र गरीब और पिछड़ा बना रहेगा अतः उन्होंने राज्य में उद्योगों की स्थापना के लिए ठोस कदम उठाए उन्होंने ही घनश्याम दास बिरला को ग्वालियर में अपना कपड़ा मिल स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया अनेक उद्योग सरकारी क्षेत्र में स्थापित किए गए तथा ग्वालियर पोटरी लेदर फैक्ट्री ग्वालियर इंजीनियरिंग वर्कशॉप आदि इतना ही नहीं कृषि की उन्नति के लिए उन्होंने सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अनेक बांध बनाने की योजना बनाई ।

ग्वालियर का मेला भी इस क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए उन्होंने ही प्रारंभ किया इतिहास ग्वालियर मेला वर्ष 1905 में प्रारंभ हुआ इसकी प्लेटिनम जुबली 1980 में  मनाई जाने वाली थी किंतु कुछ व्यवहारिक कठिनाइयों के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका अतः उसकी 1967 68 में स्वर्ण जयंती और 1982 83 में प्लेटिनम जुबली तथा 2005 में इसका शताब्दी मनाई गई ।

प्रारंभ में यह मेला सागर ताल के मैदान में लगता था क्योंकि वहां पानी की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध थी  यह मेला  पशु मेला था  धीरे धीरे  इसका विस्तार होता गया  जिसके लिए सागर ताल के मैदान में  लगने वाले  मेले में  प्रतिवर्ष अस्थाई दुकानें  बनाई जाती थी  तथा इसके लिए  बांस बलिया मुफ्त में दी जाती थी तथा पशुओं के चारे की व्यवस्था भी रहती थी।

इस मेले में ही प्रकाश और सुरक्षा की बहुत अच्छी व्यवस्था होती थी सर्दी से बचने के लिए अलाव जलाए जाते थे उस समय मेले में जाने के लिए बैल गाड़ियों तथा तांग ओ का उपयोग होता था ।इस मेले में व्यापारियों तथा ग्राहकों को अधिकाधिक संख्या में आकर्षित करने के लिए ग्वालियर राज्य के बाहर से आने वाले माल पर लगने वाली सीमा शुल्क में पर्याप्त रियायत दी जाती थी जो 50% तक होता था परिणाम स्वरुप व्यापारी बड़ी मात्रा में बाहर से माल मंगातेऔर सस्ते दामों पर बेच  देते ।ग्राहक भी महीनों की आवश्यकता की वस्तुएं मेले में खरीदते और घर ले जाते सूखे मेवे काजू किशमिश बादाम अखरोट जिन्हे हम आज 200 ग्राम की मात्रा में खरीदने की हिम्मत नहीं कर पाते सेरो और पसेरी ओं में खरीदे जाते थे ।

ग्वालियर व्यापार मेला मुख्यतः ग्वालियर क्षेत्र में कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया गया था क्योंकि कृषि ही भारत की तत्कालीन अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में इस क्षेत्र में अनेक मर्तबा सूखे और अकाल की स्थिति उत्पन्न हुई इस स्थिति के स्थाई उपचार के लिए स्वर्गीय माधवराव सिंधिया प्रथम  ने राज्य में  कृषि की स्थिति सुधारने और पशु पालन को बढ़ावा देने के निर्णय लिए तथा ग्वालियर मेले को इसका माध्यम बनाया ।

सन 1911 में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे अभूतपूर्व सफलता मिली इसके बाद लगभग प्रतिवर्ष प्रदर्शनी लगने लगी और सागर ताल का मेला सागर ताल का मैदान मेले के लिए छोटा प्रतीत होने लगा। अतः नए स्थान की खोज हुई तो इस मेले को कटोरा ताल और फिर वर्तमान स्थान का चयन किया गया क्योंकि लश्कर ग्वालियर और मुरार तीनों शहरों के बीचो-बीच था ।

1918 से नए स्थान पर ग्वालियर मेला भरना शुरू हुआ इस वर्ष एक अखिल भारतीय कृषि उद्योग प्रदर्शनी का भी आयोजन हुआ जिससे मेले में चार चांद लग गए इसके बाद से कृषि प्रदर्शनी तो मेले का अनिवार्य अंग बन गई तथा मेले में आने वाले प्रश्नों के आकर्षण का मुख्य केंद्र भी बन गई । समय के साथ सब कुछ बदलता है तो मेला भी बदला है वक्त के साथ वह हाईटेक हो गया है ग्वालियर मेला जो अपना-अपना शताब्दी समारोह मना चुका है इसका एक जीवंत उदाहरण है ।

व्यक्ति की तरह इसकी जिंदगी में भी तमाम उतार-चढ़ाव आए मगर हर स्थिति का स्नेह दिलेरी से सामना किया और मजबूती के साथ उभर कर सामने आया पशु मेले से लोहा पीट आ फिर चार्ट झूलों से व्यापार तक का स्वरूप इस मेले ने देखा और पाया है। जब अब जब मेला अपनी स्थापना की 113 बी सी डी पर कदम रख रहा है तो यह ना केवल ग्वालियर अपितु देश के मेलों के लिए एक मिसाल है । ग्वालियर गौरव  से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हुआ है तो उसकी खुशी का कई गुना अधिक होना स्वभाविक है ।ऐसे समय जब व्यक्ति की व्यवस्थाओं ने मेले और संस्कृति के आयोजन की उम्र को कुछ हद तक कम कर दिया है ऐसे में शहर का अपनी लोक संस्कृति से जुड़े रहना सराहनीय है।

कृषि प्रदर्शनी इस कृषि प्रदर्शनी में अच्छे और सुधरे हुए रोगमुक्त पीजों तथा और वर्क और उर्वरकों का प्रदर्शन होता था तथा उनके उपयोग के लाभ कृषकों को बताए जाते थे साथ ही पशुओं को विभिन्न बीमारियों और कीड़ों से बचाने के उपाय बताए जाते थे प्रदर्शनी में सुधरे हुए किस्म के हलो तथा सिंचाई पंपों का भी प्रदर्शन होता था ग्वालियर क्षेत्र में कृषि का जो विकास हुआ है उसमें ग्वालियर मेले के साथ प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली कृषि प्रदर्शनी यों का बहुमूल्य योगदान रहा है।

पशु प्रदर्शनी पहले भारतीय कृषि बहुत कुछ पशुओं पर निर्भर थी खेत जोतने का काम मुख्य था बैलों से लिया जाता था । कहीं-कहीं भैसे भी इसके लिए प्रयुक्त किए जाते थे अतः किसानों को अच्छी किस्म और नस्ल के बैल बताने के लिए  पशु प्रदर्शनी भी शुरू की गई । वर्तमान में बैल और भैंसों के स्थान पर अब ट्रैक्टर की मदद से खेती होने लगी है अतः अब कृषि महकमों की प्रदर्शनी में ट्रैक्टरों के बारे में जानकारी दी जाने लगी है। भारत में कृषि को एक जुआ माना जाता रहा है क्योंकि वह मुख्यतः वर्षा पर निर्भर करती है।

मेले का भविष्य सन 1964 तक ग्वालियर मेले में काफी प्रगति की लेकिन उसके बाद उसकी प्रगति पर पूर्ण विराम लग गया प्रतीत होता है कभी-कभी तो यह महसूस होता है कि ग्वालियर मेले की प्रगति ना केवल रुक गई है बल्कि प्रगति चक्र विपरीत दिशा में घूमने लगा है । पूर्व ग्वालियर राज्य में और मध्य भारत राज्य में ग्वालियर मेला राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वार्षिक आयोजन होता था।

ग्वालियर रियासत के महाराज स्वयं मेले में आते थे और मेले में ही उनके मंत्रियों के कैंप लगते थे यहां तक कि जिले की शुरुआत और पर गानों की कचहरी के कैंप भी मेले में लगाए जाते थे माधव महाराज द्वारा शुरू की गई यह परंपरा मध्य भारत काल तक ही चली ।मेले के उद्घाटन और समापन के लिए केंद्रीय मंत्री  आते थे। बाद में केंद्रीय मंत्रियों का आना बंद हो गया ग्वालियर राज्य का जब शेष भारत में वित्तीय सम्मेलन अथवा एकी करण हुआ तभी सीमा शुल्क समाप्त हो गया और बंद हो गया जो प्रोत्साहन मिलता था वह समाप्त हो गया किंतु मध्य भारत सरकार ने मेले में पर्याप्त दिलचस्पी ले कर मेले को न केवल जारी रखा बल्कि उसे और बड़ा किया । मध्य भारत में मेले में कृषि और पशु ग्रामोद्योग  प्रदर्शनी या बड़े पैमाने पर लगने लगी किंतु मध्य प्रदेश सरकार के बनने के बाद राज्य सरकार का ध्यान इधर कम हो गया जब हालांकि जब माधवराव सिंधिया  केंद्रीय रेल राज्य मंत्री बने तो उन्होंने ग्वालियर के सर्वांगीण विकास के लिए दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया । उन्होंने ग्वालियर व्यापार मेले को व्यापार बढ़ाने के लिए आम भूमिका अदा की मेले को और निखारने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के चुनिंदा लोगों से साथ लेकर व्यापार मेले के माध्यम से मेले को प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनाने की शुरुआत की और परिवार के साथ आना शुरू किया। 1996 में ग्वालियर व्यापार मेला का प्राधिकरण गठन होने पर और माधवराव सिंधिया को अध्यक्ष बनाने के बाद मेला और तेजी से निखार आया। इसके फलस्वरूप ग्वालियर मेले के अच्छे दिन वापस लौटने लगे उसके योवन में निखार आने लगा था लेकिन उनके निधन के बाद मेले का आयोजन औपचारिकता भर रह गया । और इस रस्म अदायगी के चलते मेले के प्रति लोगों का रुझान तेजी से घटने लगा था।

ग्वालियर के 113 वर्षीय मेले की रौनक लौटने की पहल उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही कर दी थी। सिंधिया की दिलचस्पी का ही परिणाम है कि मेले के अच्छे दिन वापस लौटने लगे हैं ।मेला उतना ही आकर्षक हो गया है जितना आकर्षक वह 1984 85 में हुआ करता था सिंधिया की पहल पर 11 वर्ष बाद लगे ऑटोमोबाइल सेक्टर में बिकने वाली गाड़ियों पर रोड  टैक्स पर 50 प्रतिशत की छुट ने मेले की  शोहरत ना केवल  प्रदेश में बल्कि अन्य शहरों में भी फैला दी है।  यह कहना  अतिशयोक्ति  ना होगा कि बीते सालों की अपेक्षा मेले में  इस साल ज्योतिरादित्य सिंधिया  के प्रयासों ने व्यवसायिक प्रवृत्ति की  जो रफ्तार पकड़ी है  वह यदि आगे आने वाले  सालों में  इसी तरह कायम रही तो श्रीमंत  माधवराव सिंधिया  ग्वालियर व्यापार मेला  अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय पटल पर भी  अपनी एक पृथक पहचान कायम कर पाने में सफल रहेगा ।

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