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किसान कर्जमाफीः वोटों की फसल के लिए कटेगी आम आदमी की जेब

लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बन गई है. इन चुनावों में कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण किसानों से कर्ज माफी का वादा माना जा रहा है. इस जीत के बाद एक बार फिर कई राज्य किसानों की कर्ज-माफी का ऐलान कर रहे हैं ताकि आम चुनावों में किसान की नाराजगी वोट न काट ले. कर्जमाफी के ऐलान से वोट बचेंगे या नहीं, ये तो आम चुनाव के नतीजे ही बताएंगे लेकिन इतना तय है कि कर्ज माफी की होड़ आम कर दाताओं की जेब जरूर काट लेगी.

कर्ज माफी से यूं कम हो रही जीडीपी

दरअसल 2017 से देश में जारी किसान कर्ज माफी के राजनीतिक दांव से ज्यादातर राज्यों का खजाना दबाव झेल रहा है. किसान कर्ज को माफ करने की शुरुआत करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 34,000 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया और राज्य की जीडीपी 1.3 फीसदी कम हो गई. इसके बाद उत्तर प्रदेश में बनी योगी सरकार ने 36,000 करोड़ रुपये की कर्ज माफी की और राज्य की जीडीपी को 2.7 फीसदी की चोट पहुंची. फिर पंजाब ने 10,000 करोड़ और राजस्थान ने फरवरी 2008 में 8000 करोड़ रुपये के किसान कर्ज माफ किए और राज्यों की जीडीपी में 2.1 फीसदी और 0.9 फीसदी का नुकसान हुआ. इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी के मुताबिक इन सभी कर्ज माफी को मिलाकर इस दौरान कुल 1 लाख 72 हजार 146 करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान किया जा चुका है.

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इंडिया टुडे के नेशनल अफेयर्स एडिटर राहुल श्रीवास्तव का कहना है कि कर्ज माफी को राजनीतिक हथियार 2008 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने बनाया और 70,000 करोड़ रुपये की देशव्यापी कर्ज माफी का ऐलान किया. लेकिन इस ऐलान के बाद अगले चार साल के दौरान केन्द्र सरकार 52,000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर पाई और वादे के मुताबिक 18,000 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया रह गया. ठीक इसी तरह कर्नाटक में बनी नई कुमारास्वामी सरकार ने 8,000 करोड़ रुपये के कर्जमाफी का ऐलान किया लेकिन अभी तक महज 400 करोड़ रुपये का कर्ज माफ हो सका है. लिहाजा, सवाल खड़ा होता है कि जब केन्द्र या राज्य सरकारें किसान कर्ज को माफ करने का ऐलान करती हैं तो क्यों पूरा कर्ज चुका नहीं दिया जाता. आखिर किन किसानों का कर्ज बाकी रह जाता है जिसका पैसा सरकारी खजाने से नहीं मिलता? राहुल श्रीवास्तव का कहना है कि इससे यह भी साफ है कि ऐसे चुनावी वादों का फायदा किसानों तक नहीं पहुंचता.

कर्जमाफी से जरूरी नहीं चुनावी फायदा

अंशुमान तिवारी कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि चुनाव से पहले किसान कर्ज माफी का ऐलान करने से जीत तय की जा सकती है. कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने कर्जमाफी का ऐलान किया लेकिन इसका कोई सीधा असर चुनाव नतीजों पर नहीं दिखा. वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे की सरकार ने चुनावों से पहले 8,000 करोड़ की कर्ज माफी का ऐलान किया और वह सत्ता से बाहर बैठी है.

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अंशुमान तिवारी ने बताया कि देश में 2017 से लेकर अभी तक सात राज्यों में कर्ज माफी का राजनीतिक दांव चला गया है. पंजाब और महाराष्ट्र में जून 2017, उत्तर प्रदेश में अप्रैल 2017, राजस्थान में फरवरी 2018, कर्नाटक में जुलाई 2018, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में दिसंबर 2018 में ये हुआ.

किसान कर्ज माफी का आंकड़ा

रिजर्व बैंक के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में किसान कर्ज माफी की कितनी जरूरत है. आंकड़ों के मुताबिक जहां मध्य प्रदेश में कुल कर्ज का 29 फीसदी और राजस्थान में 35 फीसदी कृषि क्षेत्र में कर्ज है. वहीं मध्य प्रदेश में कृषि क्षेत्र में फंसा हुआ कर्ज 11 फीसदी है. इस कर्ज को माफ करने के लिए राज्य सरकार ऐलान कर रही है लेकिन इस कर्ज का कितना हिस्सा केन्द्र और कितना राज्य सरकार देगी यह अभी तय नहीं है. अंशुमान तिवारी ने कहा कि इसके चलते उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की सरकार को कर्ज माफी की पूरी रकम अपने बजट से निकालनी पड़ी. इस रकम के लिए उत्तर प्रदेश को विकास के काम को एक-तिहाई कम करना पड़ा वहीं महाराष्ट्र सरकार को अपना खर्च निकालने के लिए शिरडी के मंदिर से कम दर पर कर्ज लेना पड़ा. जाहिर है कि कर्ज माफी का यह दांव राजनीतिक दलों को वोट दिलाए न दिलाए इसका खामियाजा एक आम टैक्स पेयर को भरना पड़ेगा क्योंकि सरकारों को अपना खर्च निकालने की प्राथमिकता के बाद वोट बटोरना ही प्राथमिकता है और इस बीच विकास की रफ्तार पर लगाम लगी रहेगी.

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