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नई दिल्ली
फ्रांस की एयर और स्पेस फोर्स का ‘मिशन पेगासे’ अपनी 40 हजार किलोमीटर की यात्रा पर है। अभी भारत में है। 2018 में पेगासे मिशन शुरू हुआ था और ये इसका सातवां एडिशन है। 2018 में शुरू किए गए इस मिशन में 300 एयरक्रू के साथ चार राफेल, तीन A330 MRTT फीनिक्स और दो A400M एटलस विमान तैनात किए गए हैं। मिशन की शुरुआत आर्कटिक से हुई है और इस मिशन में नौ जगहों पर फ्रांस के ये विमान रुकेंगे। यह मिशन प्रशांत, पूर्वी एशिया और हिंद महासागर होते हुए मध्य पूर्व और आसपास तक जाएगा। Mission Pégase -26 के हेड मेजर जनरल जूलियन साबेने ने एनबीटी से बात की। उन्होंने बताया कि यह मिशन क्यों अहम है।
बहुत गहन और व्यस्त मिशन
मेजर जनरल जूलियन ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह वास्तव में बहुत गहन और व्यस्त मिशन है। आप एक नए वातावरण में पहुंचते हैं और लगातार परिस्थितियां बदलती रहती हैं। हम अलास्का के आर्कटिक क्षेत्र के बेहद ठंडे मौसम से आए। इसके बाद अचानक जापान पहुंचे, जहां तापमान 25 डिग्री सेल्सियस है। सिर्फ वातावरण ही अलग नहीं होता, बल्कि टाइम जोन भी बदल जाता है।
MRTT विमान से किया जाता कंट्रोल
जब आप 10 घंटे की उड़ान भरते हैं, तो ऐसा नहीं है कि आपको आराम से नींद मिल जाए। पूरा पेगासे मिशन कमांड और कंट्रोल के तहत चलता है। यह कमांड और कंट्रोल हमारे एक MRTT विमान से किया जाता है, जहां मैं तैनात हूं। साथ ही फ्रांस में स्थित ऑपरेशन सेंटर से भी हमारा संपर्क रहता है। इसलिए हम लगातार व्यस्त रहते हैं। जब हम किसी जगह पहुंचते हैं तो हमारा मन करता है कि होटल जाकर सो जाएं, लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते।
गर्मजोशी से स्वागत करते हैं सहयोगी देश
वहां हमारे सहयोगी देशों के लोग हमारा गर्मजोशी से स्वागत करते हैं और उसके बाद अलग टाइम जोन की वजह से जेट लैग भी होता है। हमें अपने शरीर की सामान्य सर्केडियन रिदम यानी जैविक दिनचर्या में वापस आने में करीब एक सप्ताह लगता है। और जब तक हम वहां की परिस्थितियों के अभ्यस्त होते हैं, तब तक वापस निकलने का समय आ जाता है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम कहीं भी लंबे समय तक स्थिर नहीं रहते। इसका शरीर पर काफी असर पड़ता है।
दुनिया का कोई भी कोना बस 48 घंटे दूर
उन्होंने कहा इस साल हमने मिशन में चार लड़ाकू विमान तैनात किए हैं। 2018 में तीन थे, जबकि 2023 में हमने 10 लड़ाकू विमान तैनात किए थे। इन तीनों स्थितियों में काफी अंतर है। जब आप 10 लड़ाकू विमानों के साथ पहुंचते हैं तो उन्हें एक ही एयरपोर्ट पर उतारना संभव नहीं होता। आपको अलग-अलग जगहों पर विमानों को रखना पड़ता है, क्योंकि एयरपोर्ट पर इतनी जगह या पार्किंग एरिया नहीं होता कि इतने सारे विमान एक साथ खड़े किए जा सकें। इसलिए हर मिशन अलग होता है।
बड़े स्तर की तैनाती करने में सक्षम
हम बिना देरी किए इतने बड़े स्तर की तैनाती करने में सक्षम हैं और मिशन को तय योजना के अनुसार पूरा कर सकते हैं। आज Pegasus में हम जो कुछ कर पा रहे हैं, उसमें हमारे नए उपकरणों की भी बड़ी भूमिका है। पहले हमारे पास Mirage, C-135 और Transall विमान थे। ये लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले विमान नहीं थे। अब हमारे पास MRTT, Rafale और A330 का एक बहुत अच्छा संयोजन है। ये विमान एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छी तरह काम करते हैं।
तेजी से कर सकते हैं काम
अब दुनिया के लगभग किसी भी हिस्से तक 48 घंटे के भीतर पहुंचना संभव है। वहां पहुंचने के बाद हम बहुत तेजी से विमान में ईंधन भर सकते हैं, हथियार लगा सकते हैं और उसे किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार कर सकते हैं। यह क्षमता हमारे पास पहले नहीं थी। यही क्षमता हमें दुनिया के किसी भी हिस्से में ऑपरेशन करने में सक्षम एक वैश्विक ताकत बनाती है।
चुनौती ये कि कहीं भी आत्मनिर्भर तरीके से ऑपरेशन चलना
उन्होंने कहा कि हमने इन सभी तैनातियों के लिए एक ऐसा तरीका विकसित कर लिया है, जिससे हम हर तरह की तैनाती को सपोर्ट कर सकें। जब हम फ्रांस से रवाना होते हैं तो अलग-अलग विमानों में हमारे पास जरूरत की लगभग हर चीज होती है। हमारे पास MRTT होता है, कार्गो विमान यानी Airbus A330 होता है। इसमें अलग-अलग तरह के लोग होते हैं- इंजीनियर, एयर सपोर्ट टीम, आईटी सपोर्ट टीम और दूसरे कर्मचारी। हमारे पास स्पेयर पार्ट्स, औजार और जरूरत की बाकी सभी चीजें भी होती हैं।
2018 में की थी शुरुआत
इसके बाद जब हम अलग-अलग जगहों पर रुकते हुए आगे बढ़ते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती होती है कि हम किसी भी क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर तरीके से अपना ऑपरेशन चला सकें। अब हम इस मामले में काफी अनुभवी हो गए हैं। जब हमने 2018 में शुरुआत की थी, तब यह समझना बहुत बड़ी चुनौती थी कि हमें अपने साथ क्या-क्या लेकर जाना है। हम सब कुछ अपने साथ नहीं ले जा सकते थे, क्योंकि हमें लड़ाकू विमान और उसमें सवार लोगों को भी ले जाना होता था।
सटीकता के साथ कर सकते हैं काम
अब हमें काफी अनुभव हो गया है। हम पहले से अनुमान लगा सकते हैं कि जिस तरह के वातावरण में हम ऑपरेशन करने जा रहे हैं, उसमें किस तरह की खराबी या समस्या आने की संभावना है। इसके आधार पर हम बहुत सटीक तरीके से जरूरी स्पेयर पार्ट्स का पैकेज तैयार करते हैं। अब यह काम हम पहले से कहीं ज्यादा सटीकता के साथ कर पाते हैं।
हर जगह कुछ नया अनुभव
मेजर जनरल जूलियन ने कहा कि अलग-अलग जगहों पर रुकने से हमें बहुत कुछ हासिल भी हुआ। हमें बेहतरीन बातचीत और अनुभव मिले। हमें उनकी संस्कृति को समझने का मौका मिलता है। साथ ही, हमें एयर ऑपरेशंस और स्पेस ऑपरेशंस को संचालित करने के अलग-अलग तरीकों को जानने का मौका मिलता है। यह एक तरह से बेस्ट प्रैक्टिसेज का आदान-प्रदान है। हम जहां भी जाते हैं, वहां कुछ नया सीखते हैं और कोशिश करते हैं कि जो अनुभव हमें वहां के लोगों से मिल रहा है, हम भी उन्हें अपना अनुभव और जानकारी दे सकें।
क्या है इसकी सबसे बड़ी खासियत
अगर हम अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और भारत की तुलना करें, तो ये यहां बहुत अलग-अलग संस्कृतियां हैं। यह अनुभव बेहद दिलचस्प है, लेकिन हमें हर जगह के हिसाब से खुद को ढालना भी पड़ता है। जब तक हम एक संस्कृति और माहौल के अभ्यस्त होते हैं, तब तक दूसरी जगह जाने का समय आ जाता है। इस पूरी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हमें 360 डिग्री का अनुभव देती है।
पूनम पाण्डे
Dainik Aam Sabha