नई दिल्ली
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण कार्य (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग के पास SIR का अधिकार है. एसआईआर पर दायर यायिकाओं से जुड़े मामले में सर्वोच्च अदालत ने मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) करने के भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार को बरकरार रखा है. अदालत ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि ECI ने SIR का प्रयोग करके अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर जाकर कार्य किया है. इसे 'अल्ट्रा वायर्स' भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह कार्य-प्रणाली उस सामान्य प्रक्रिया से भिन्न है जो आमतौर पर अपनाई जाती है।
SIR पर सीजेआई ने क्या कुछ कहा?
SIR पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सभी पक्षों की अलग-अलग दलीलों पर गौर करने के बाद, और घटनाओं के क्रम को देखने के बाद, पार्टियों की ओर से पेश की गई दलीलों और रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री को देखने के बाद, हमारा मानना है कि इन मुद्दों का एनालिसिस करने की ज़रूरत है. सीजेआई ने तीन सवालों के जरिए अपनी बात रखीं।
SIR पर सीजेआई के तीन सवाल
क्या भारत के इलेक्शन कमीशन के पास SIR जैसी कार्रवाई करने का अधिकार है?
क्या SIR के तहत जांच किसी जायज़ मकसद पर आधारित है और अगर ऐसा है, तो क्या इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाए गए उपाय, हासिल किए जाने वाले लक्ष्यों के हिसाब से सही हैं?
क्या SIR के तहत जांच करने में इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाया गया तरीका रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट, 1950 के नियमों के खिलाफ़ है या उनका उल्लंघन करता है?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है, तो यह भी देखना होगा कि उसकी प्रक्रिया क्या होगी। हालांकि, केवल प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के आधार पर पूरे एसआईआर को अवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। पीठ ने यह भी कहा कि यह सवाल उठाया गया कि क्या इस समय एसआईआर कराने की कोई वैध आवश्यकता है। अदालत की राय में एसआईआर के दौरान उठाए गए कदम जरूरत के मुताबिक थे।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एसआईआर बिहार में चुनाव प्रक्रिया और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व से ध्यान नहीं भटकाता। उन्होंने मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डालने वाली दलील को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और रहने लगा है, तब भी वह पुरानी एसआईआर प्रक्रिया से बाहर नहीं हो जाता। उसका या उसके परिवार का नाम पुराने रिकॉर्ड में मौजूद होगा।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें सूची में शामिल किया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि एसआईआर का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था। अगर कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता है, तो चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए क्या-क्या टिप्पणी की, उन्हें बिंदुवार जानते हैं-
1. चुनाव आयोग की शक्तियां बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे निष्पक्ष और शुद्ध मतदाता सूची तय करने का अधिकार है. अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान और कानून के खिलाफ नहीं है. इसलिए SIR पूरी तरह वैध है और इसे प्रोसेस करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. आयोग इसकी शक्ति रखता है.
2. कोई प्रक्रिया थोड़ी अलग हो तो अवैध नहीं हो जाती है- सुप्रीम कोर्ट
बिहार में यह प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे चुनौती दी गई थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है और मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है. अदालत ने कहा, 'यह प्रक्रिया कानूनी रूप से मान्य है. 11 दस्तावेजों पर विचार करने और हमारे आदेश के माध्यम से आधार कार्ड को शामिल किए जाने के बाद हम इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते कि चुनाव द्वारा मांगे गए दस्तावेजों का समूह मनमाना है."
सुप्रीम कोर्ट की खास टिप्पणी-
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि SIR प्रक्रिया को केवल इसलिए 'अल्ट्रा वायर्स' (अवैध) करार देकर रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मतदाता सूचियों के संशोधन की सामान्य प्रोसेस से अलग है.
3. वोटर लिस्ट से नाम हटना, नागरिकता जाना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने SIR की प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाने का मतलब यह नहीं है कि किसी की नागरिकता खत्म हो गई. यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना था कि चुनाव आयोग का SIR अभियान 'पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच' जैसा है.
4. नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं- सुप्रीम कोर्ट
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता के सवाल को सिर्फ इस सीमित दायरे में देख सकता है कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए या हटाया जाए. अदालत ने साफ कहा कि चुनाव आयोग किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहा. नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है.
5. SIR 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' और संबंधित नियमों के विपरीत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SIR कानूनी रूप से मान्य और उचित है इसलिए यह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (RP Act) का उल्लंघन भी नहीं करता है.
पीठ ने कहा कि अदालत का निष्कर्ष है कि एसआईआर संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की कसौटी पर खरा उतरता है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इतने विस्तृत कार्य को देखते हुए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता। हालांकि, वह संदिग्ध लोगों के मामलों को केंद्र सरकार को भेज सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चुनाव आयोग जिन लोगों की नागरिकता पर संदेह जताता है, उनकी जानकारी 4 सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को दे। सक्षम प्राधिकरण अगले चुनाव से पहले तक उनके बारे में निर्णय ले।
इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीयूसीएल समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाकर्ताओं में मनोज झा, महुआ मोइत्रा, के. सी. वेणुगोपाल, पप्पू यादव और राजद सांसद सुधाकर सिंह भी शामिल हैं।
प्रक्रिया को अमान्य नहीं ठहराया जा सकताः सुप्रीम कोर्ट
SC ने आगे कहा कि जब कानून खुद ही किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर और उस तरीके से, जिसे चुनाव आयोग उचित समझे, एक विशेष संशोधन की अनुमति देता है तो इस विवादित प्रक्रिया को केवल इसलिए अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित संशोधन के लिए तय की गई सामान्य प्रक्रियाओं के हर पहलू के अनुरूप नहीं है।
SC ने कहा कि हमारी सुविचारित राय में, यह विवादित SIR, 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) और उसके नियमों की जगह नहीं लेता है. बल्कि, यह धारा 21(3) द्वारा निर्धारित सटीक कानूनी सीमाओं के भीतर, अनुच्छेद 324 के तहत दिए गए संवैधानिक आदेश में नई जान डालता है।
Dainik Aam Sabha