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केंद्रीय बजट 2026: छोटे शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद, स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ी राहत

नई दिल्ली: 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार एक फरवरी को संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 पेश करने वाली हैं. इस बार स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि सरकार दूरदराज के इलाकों और गांवों में बेहतर इलाज की सुविधाओं पर खास ध्यान देगी. विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नई तकनीक को बढ़ावा देने वाले फैसलों से आम आदमी के लिए अच्छा इलाज पाना और भी आसान हो जाएगा.

नोएडा स्थित प्रकाश अस्पताल के कार्यकारी निदेशक आयुष चौहान ने शुक्रवार को से कहा, "अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों और स्टाफ की किल्लत और बीमारियों की सही जांच न हो पाने की वजह से आज भी बहुत से लोगों को अच्छा इलाज नहीं मिल पाता. अगर हम अपने जिला अस्पतालों और गांव-कस्बों के छोटे स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाएं, मोबाइल वैन और फोन पर डॉक्टरी सलाह (टेलीमेडिसिन) की सुविधा बढ़ाएं, तो बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में लगने वाली भीड़ कम होगी और आम लोगों को आसानी से इलाज मिल सकेगा."

स्वास्थ्य सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं

भारत की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में क्षमता निर्माण से लेकर दीर्घकालिक प्रणाली मजबूती की ओर बदलाव की उम्मीद करते हुए, चौहान ने कहा, "इस समय, जोर धीरे-धीरे होने वाले खर्च के बजाय परिणामों पर आधारित निवेश पर होना चाहिए, जो सेवा वितरण में सुधार कर सके, बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सके और बड़े या छोटे स्तर पर तकनीक को जोड़ सके. आज के दौर में, स्वास्थ्य सेवा केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक आवश्यकता भी है जो रोजगार, उत्पादकता और राष्ट्रीय विकास से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है."

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए. क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र को दी जाने वाली कुल राशि को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है. खासकर इसलिए क्योंकि भारत अभी भी अन्य देशों की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बहुत छोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है. स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा' (NHA) के अनुमान के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च इसके जीडीपी के लगभग 1.8 से 2.0 प्रतिशत के आसपास ही बना हुआ है.

चौहान ने कहा- "सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाया जाना चाहिए, बीमा (इंश्योरेंस) के दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए. टियर II और टियर III शहरों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और घरेलू स्तर पर चिकित्सा उपकरणों के निर्माण को भी समर्थन दिया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि इलाज की बढ़ती लागत, गुणवत्ता के अलग-अलग मानक, योग्य कर्मियों की कमी और बिखरा हुआ बुनियादी ढांचा जैसी कई चुनौतियां, मुख्य समस्याएं हैं.

उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीतिगत स्थिरता, नियामक स्पष्टता, कौशल विकास और सार्वजनिक-निजी सहयोग में वृद्धि आवश्यक होगी. एक भविष्योन्मुखी बजट देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को अधिक सुलभ, निष्पक्ष और भविष्य के लिए तैयार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है.

2025-26 के स्वास्थ्य बजट में वृद्धि

साल 2025-26 के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय को 99,859 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह 2024-25 के संशोधित अनुमानों से 11 प्रतिशत अधिक है. 2025-26 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को मंत्रालय के कुल बजट का 96 प्रतिशत हिस्सा दिया गया है. विभाग का यह आवंटन 2024-25 के अनुमानित खर्च से 11 प्रतिशत ज्यादा है. स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को 3,901 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2024-25 के इसके अनुमानित खर्च से 15 प्रतिशत अधिक है.

एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMed) के निदेशक राजीव नाथ के अनुसार, चिकित्सा उपकरण (मेडिकल डिवाइस) क्षेत्र आगामी केंद्रीय बजट को नीतिगत इरादों को ज़मीनी प्रभाव में बदलने के एक निर्णायक अवसर के रूप में देखता है.

नाथ ने कहा, "जबकि 2025 में चिकित्सा उपकरण नीति 2023 के इर्द-गिर्द रचनात्मक जुड़ाव देखा गया, अब ध्यान निरंतर निष्पादन पर होना चाहिए. मुख्य अपेक्षाओं में अंशांकित टैरिफ सुधार और लंबे समय से चली आ रही आयात विषमताओं को दूर करने तथा घरेलू विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) का समर्थन करने के लिए मौजूदा 7.5 प्रतिशत से सीमा शुल्क को बढ़ाकर 10-15 प्रतिशत करना शामिल है."

नाथ के अनुसार, बजट को गुणवत्ता और मूल्य-आधारित सार्वजनिक खरीद को भी मजबूत करना चाहिए, जिसमें 'आईसीएमईडी' (ICMED) प्रमाणित उपकरणों को प्राथमिकता दी जाए और घरेलू मूल्यवर्धन (डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा दिया जाए.

उन्होंने कहा, "ऐसे उपाय जो नियामक पूर्वानुमान (रेगुलेटरी प्रेडिक्टेबिलिटी) को मजबूत करें, एमएसएमई (MSME) की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और नवाचार (इनोवेशन) का समर्थन करें, एक लचीला मेडटेक (MedTech) इकोसिस्टम बनाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे. यह एक ऐसा तंत्र होगा जो सामर्थ्य, विश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करेगा."

स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सा उपकरण अनिवार्य

नाथ ने कहा कि चिकित्सा उपकरण स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए अनिवार्य हैं, विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल स्तरों पर, जहां जांच (डायग्नोस्टिक्स), निगरानी और आवश्यक उपकरण परिणामों में काफी सुधार कर सकते हैं. उन्होंने कहा-"पहुंच बढ़ाने के लिए न केवल बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे नीतिगत ढांचे की भी जरूरत है जो सभी भौगोलिक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण उपकरणों की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करें."

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक खरीद के माध्यम से घरेलू स्तर पर निर्मित और आईसीएमईडी (ICMED) प्रमाणित, किफायती चिकित्सा उपकरणों को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ क्षेत्रीय अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है.

नाथ ने कहा, "इसके अतिरिक्त, पारदर्शी लेबलिंग नियम जो घरेलू सामग्री का खुलासा करते हैं और स्थानीय मूल्यवर्धन (लोकल वैल्यू एडिशन) को प्रोत्साहित करते हैं, वे भरोसे और स्वीकार्यता को बढ़ा सकते हैं. देश भर में स्वास्थ्य सेवा को सुलभ, निष्पक्ष और टिकाऊ बनाने के लिए एक मजबूत घरेलू मेडटेक (MedTech) आधार होना अनिवार्य है."

कई चुनौतियों का सामना कर रहा स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट आवंटन में अगले 5 वर्षों तक हर साल कम से कम 30 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि (compounded increase) करना आवश्यक और सामयिक दोनों है.

नाथ ने कहा, "जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवा की मांग बढ़ रही है और प्रणाली विकसित हो रही है, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, तकनीक को अपनाने और सेवा वितरण में सुधार के लिए निरंतर सार्वजनिक निवेश आवश्यक है. बजट का बढ़ा हुआ आवंटन रणनीतिक रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं के आधुनिकीकरण, जांच (डायग्नोस्टिक) क्षमता के विस्तार और गुणवत्ता-सुनिश्चित चिकित्सा उपकरणों की खरीद में लगाया जाना चाहिए. महत्वपूर्ण बात यह है कि बजटीय सहायता ऐसी नीतियों के अनुरूप होनी चाहिए जो घरेलू विनिर्माण और नवाचार (इनोवेशन) को प्रोत्साहित करें, ताकि सार्वजनिक खर्च से राष्ट्रीय क्षमता का भी निर्माण हो सके."

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य व्यय को औद्योगिक और विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) प्राथमिकताओं के साथ जोड़कर, सरकार एक साथ मरीजों की पहुंच में सुधार कर सकती है, स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती बढ़ा सकती है और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती है. इससे स्वास्थ्य सेवा वितरण और घरेलू मेडटेक (MedTech) विकास के बीच एक सकारात्मक चक्र (virtuous cycle) का निर्माण होगा.

नाथ ने कहा कि भारत का स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. जिसमें महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता, गुणवत्तापूर्ण देखभाल तक असमान पहुंच और अधिक स्पष्ट नियामक (रेगुलेटरी) नीतियों की आवश्यकता शामिल है.

उन्होंने कहा- "इन चुनौतियों से निपटने के लिए समन्वित नीतिगत कार्रवाई, स्थानीय उद्योग को समर्थन देने के लिए तर्कसंगत शुल्क संरचना, गुणवत्ता और स्थानीय मूल्यवर्धन को पुरस्कृत करने वाले खरीद सुधार और पारदर्शिता एवं भरोसे को बढ़ाने के लिए स्पष्ट लेबलिंग नियमों की आवश्यकता है."

बजट मेडिकल टेक्नोलॉजी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण

से बात करते हुए, एसएस इनोवेशन इंटरनेशनल के संस्थापक, अध्यक्ष और सीईओ डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने भी इस बात को दोहराया कि आने वाला बजट चिकित्सा प्रौद्योगिकी (मेडिकल टेक्नोलॉजी) क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है.

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा, "भारतीय कंपनियां नवाचार तो कर रही हैं, लेकिन नीतिगत समर्थन अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है. उद्योग को वास्तव में घरेलू अनुसंधान और विकास (R&D) के लिए प्रोत्साहन, स्थानीय स्तर पर कलपुर्जे बनाने के लिए समर्थन और भारत में निर्मित उपकरणों के लिए एक अधिक समझदारी भरी जीएसटी संरचना की आवश्यकता है. लंबी अवधि की पूंजी तक पहुंच और नियामक बाधाओं में कमी भी वास्तविक बदलाव ला सकती है. यदि इन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाए, तो भारतीय मेडटेक (MedTech) बहुत तेजी से आगे बढ़ सकता है और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है."

भारतीय स्वास्थ्य सेवा में पहुंच (एक्सेसिबिलिटी) को अभी भी सबसे बड़े अंतरों में से एक बताते हुए डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि उन्नत तकनीकें केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "सही नीतियों और लागत संरचना के साथ, सर्जिकल रोबोटिक्स और एआई (AI) जैसे उपकरण छोटे शहरों में भी बेहतर परिणाम दे सकते हैं. इसमें घरेलू नवाचार एक बड़ी भूमिका निभाता है. यह लागत कम करता है और तकनीक को व्यापक रूप से अपनाना संभव बनाता है. आज स्वास्थ्य सेवा केवल इमारतों और बिस्तरों तक सीमित नहीं है. बेहतर परिणामों के लिए तकनीक केंद्र में है. बजट का अधिक आवंटन, विशेष रूप से नवाचार और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए, भारत को अपने स्वास्थ्य सेवा इकोसिस्टम को मजबूत करने में मदद करेगा."

गैर-संचारी रोग अब भी एक चुनौती

भारत में बदलते रहन-सहन और बढ़ती उम्र के कारण जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों जैसे कि कैंसर, डायबिटीज, बीपी, दिल की बीमारियां, किडनी या फेफड़ों की समस्या का खतरा बहुत बढ़ गया है. इन रोगों की वजह से न सिर्फ मौतें बढ़ रही हैं, बल्कि लोग लंबे समय तक बीमार और लाचार भी रह रहे हैं. इन हालातों को देखते हुए अब बहुत ज़रूरी है कि इन बीमारियों को रोकने और समय पर इनके इलाज के इंतजामों में तेज़ी लाई जाए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 'NCD इंडिया प्रोफाइल-2018' के अनुसार, देश में होने वाली कुल मौतों में से लगभग 63 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों (NCDs) के कारण होती हैं. इनमें हृदय रोग (कार्डियोवैस्कुलर डिजीज) मौत का सबसे बड़ा कारण है, जिससे 27 प्रतिशत मौतें होती हैं. इसके बाद पुरानी श्वसन संबंधी बीमारियां (11 प्रतिशत), कैंसर (9 प्रतिशत), मधुमेह (3 प्रतिशत) और अन्य बीमारियां (13 प्रतिशत) आती हैं.

गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD) के अनुसार, भारत का लक्ष्य अपनी रणनीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से 2030 तक इन बीमारियों से जुड़े विभिन्न संकेतकों में सुधार करना है.