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सीएम रहते 13 साल कभी नहीं गए जिस शहर, आज वहां क्यों जा रहे हैं शिवराज सिंह चौहान

लोकसभा चुनाव 2019 धीरे-धीरे अपने अंतिम पड़ाव की ओर है. देश में कुल सात चरणों में मतदान होना है, जिसमें आज (6 मई) पांचवे चरण का मतदान जारी है. इसमें मध्य प्रदेश की भी 7 सीटों पर मतदान किए जा रहे हैं. इस दौरान पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान प्रदेश में खुद ही बीजेपी के प्रचार की कमान संभाले हुए हैं. विधान सभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद शिवराज सिंह चौहान ने पूरे प्रदेश का दौरान करना शुरू कर दिया था. ऐसे में वह प्रदेश की उन जगहों पर जा रहे हैं, जहां वह मुख्यमंत्री रहते हुए 13 साल में भी नहीं गए.

पूर्व सीएम ने एक ट्वीट में कहा है “मेरे प्यारे अशोकनगर, गुना, राजगढ़, सीहोर के भाइयों-बहनों प्रणाम! मैं आज आपके बीच आ रहा हूं. हम सब मिलकर नये मध्यप्रदेश और सशक्त भारत के निर्माण के लिए मंथन करेंगे. जन-जन के प्रयास से ही यह लक्ष्य प्राप्त होगा. आइये, साथ मंथन करें, कदम बढ़ाएं.”

इन शहरों में कई ऐसे शहर हैं जहां शिवराज अपने मुख्यमंत्री काल के 13 साल में या तो गए ही नहीं या इक्का-दुक्का बार गए हैं. अशोक नगर तो ऐसा शहर है जहां शिवराज सीएम रहते एक भी बार नहीं गए. यहां तक की विधानसभा चुनावों के दौरान शिवराज ने इस शहर में कोई चुनावी दौरा तक नहीं किया. इसके पीछे की वजह एक अंधविश्वास बताया जाता है. मान्यता है कि जो इस शहर में सीएम के रूप  में जो दौरा करता है, वह अगली बार चुनाव हार जाता है.

149 रैलियां और रोड़ शो, नहीं गए अशोकनगर-

हाल ही में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान शिवराज ने प्रदेश में ताबड़तोड़ रैलियां और रोड शो किए. उन्होंने अपने चुनावी अभियान के दौरान प्रदेश में कुल 149 रैलियां और रोड़ शो किए, लेकिन वे अशोकनगर नहीं गए. शिवराज ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत बुधनी से की और खत्म कोलार में किया. इन शहरों के चुनाव के पीछे भी अंधविश्वास ही है. दोनों शहर शिवराज के लिए अच्छे माने जाते हैं. हालांकि विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो प्रदेश में कांग्रेस ने शिवराज का रास्ता रोक दिया.

गुना में बढ़ी शक्रियता-

मध्य प्रदेश की गुना संसदीय सीट कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक मानी जाती है. यहां से मौजूदा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं. गुना संसदीय क्षेत्र पर सिंधिया राजघराने के सदस्यों का लंबे अरसे से कब्जा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 40 संसदीय क्षेत्रों का प्रभारी बनाया गया है. जिसके चलते सिंधिया गुना में कम समय दे रहे हैं. ऐसे में यह पहली बार है जब ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा का चुनाव तो लड़ रहे हैं लेकिन इलाके में सक्रिय नहीं हैं. अपनी सीट से दूर रहकर चुनाव जीतना इस बार उनके लिए एक बड़ी चुनौती है. बीजेपी ने गुना से केपी यादव को चुनाव मैदान में उतारा है. बीजेपी के बड़े नेता कांग्रेस के इस गढ़ को ढ़हाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं.

राघोगढ़ से चुनाव हारे थे शिवराज-

शिवराज सिंह चौहान ने अपने अभी तक के राजनीतिक जीवन में केवल एक बार हार का सामना किया है. साल 2003 में बीजेपी ने शिवराज को उस समय के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ राघोगढ़ से खड़ा किया था. इस चुनाव में शिवराज ने दिन-रात मेहनत की और प्रचार में जान झोंक दी. फिर भी शिवराज सिंह चौहान को हार का सामना करना पड़ा. हालांकि शिवराज को भी इस बात का अंदेशा था कि राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह को हराना संभव नहीं है, फिर भी शिवराज ने पार्टी हाईकमान की बात मानी और दिग्विजय सिंह के सामने चुनाव लड़े.

शिवराज का अब तक राजनीतिक सफर-

शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से छात्र नेता के रूप में हुआ था. साल 1988 में शिवराज भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने थे. इसके बाद शिवराज सिंह पहली बार 1990 में बीजेपी के टिकट पर बुधनी से विधानसभा चुनाव लड़े. इस दौरान शिवराज ने पूरे इलाक़े की पदयात्रा की थी. शिवराज पहला चुनाव जीतने में सफल रहे. उस वक्त शिवराज सिंह चौहान की उम्र महज 31 साल थी.

संसदीय राजनीति में शिवराज का आगमन 1991 में हुआ. 10वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव हुए आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने दो जगहों से नामांकन किया था. वे उत्तर प्रदेश के लखनऊ और दूसरा मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव लड़े और दोनों जगह से जीत हासिल की. बाद में उन्होंने विदिशा संसदीय सीट छोड़ दिया. इसके बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी ने शिवराज सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया और वे पहली बार में ही चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे. इसके बाद शिवराज यहां से 1996, 1998, 1999 और 2004 में भी लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे.

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