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पापों का नाश करती है मोहिनी एकादशी

-विजय पांडेय

मोहिनी एकादशी एक मई रविवार को है। हिंदू धर्म के मुताबिक इस एकादशी के व्रत से सहस़्त्र गौदान के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस बार दो योगों के संयोग से इसका महत्व और बढ़ गया है।
वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं। भगवान विष्णु ने असुरों का विनाश करने और देवताओं को विजय दिलाने के लिए इस दिन मोहिनी रूप धारण किया था। इस कारण यह मोहिनी एकादशी कहलाती है। यह श्रीहरि का एकमात्र स़्त्री अवतार था।
पंडितों एवं ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक इस व्रत के प्रताप से मनुष्य संसार के मोह जाल से मुक्त हो जाता है। उसके समस्त पाप, क्लेश, दुःख दूर हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार संसार में एकादशी व्रत से उत्तम दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य के श्रवण व पठन से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य एक सहस्र गौदान के पुण्य के समान है। इस दिन रवि और धु्रव योग का संयोग बनने से एकादशी का महत्व और बढ़ गया है। इस योग में पूजा-अर्चना करने से भगवान विष्णु की कृपा हमेशा बनी रहेगी। दुःखों से छुटकारा मिलेगा, दरिद्रता मिटेगी और घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा। व्रत का अक्षत फल समस्त परिवार को मिलेगा। साथ ही असीम सौंद्रर्य और तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।
रविवार को होगा आगमन
इस बार 30 अपै्रल रविवार को रात आठ बजकर 28 मिनट पर एकादशी प्रारंभ होकर एक मई सोमवार को रात 10 बजकर नौ मिनट पर समाप्त होगी। जबकि इसका पारण दो मई मंगलवार को सुबह पॉंच बजकर 40 मिनट से आठ बजकर 19 मिनट तक रहेगा। उदया तिथि के अनुसार एक मई को व्रत मान्य होगा।
ऐसे करें पूजा
मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और महालक्ष्मी देवी को गंगाजल से स्नान कराकर लाल और पीत वस्त्र अर्पित कर उनका श्रृंगार कर पूजा-अर्चना करें। धूप-दीप से आरती कर गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाएं। शाम को तुलसी के पौधे के सामने घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर ओम…. श्री तुलस्यै विद्महे विष्णु प्रियायै धीमहि। तन्नो वृंन्दा प्रचोदयात्।। मंत्र का जाप करते हुए 11 परिक्रमा करें। अविवाहित युवक-युवतियां जगत के पालनहार को पीले पुष्प अर्पित करें। ऐसा करने से शीघ्र विवाह का योग बनता है। गाय को हरा चारा खिलाएं।
मोहिनी एकादशी व्रतकथा
सरस्वती नदी के तट पर स्थित भद्रावती नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा का राज था। नगरी में धन-धान्य से संपन्न व पुण्यवान धनपाल नामक वैश्य भी रहता था। वह श्रीहरि का भक्त होने के साथ ही अत्यंत धर्मालु था। परोपकारी भाव के कारण उसने नगर में अनेक कुएँ, सरोवर, धर्मशाला, भोजनालय और प्याऊ का निर्माण कराया था। फलदार और छायादार वृक्ष भी लगवाए थे। उसके सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि ये पांॅच पुत्र थे। इनमें से पॉंचवां पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह किसी का सम्मन नहीं करता था। सदैव वेश्या, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के के साथ रहकर मांस-मदिरा का सेवन करता था। अनेक कुकर्मां में अपने पिता के धन को खर्च करता रहता था। उसके इन्हीं बुराईयों के कारण पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। वह अपने गहने और कपड़े बेचकर जीवन यापन करने लगा। जब उसके पास कुछ नहीं बचा तो वैश्या और दुराचारियों ने भी उसे दुत्कार दिया। भूख-प्यास से व्याकुल होने पर चोरी करने लगा।
एक बार पकड़ में आने पर उसके पिता के नाम पर उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। लेकिन वह दूसरी बार भी पकड़ में आ गया। राजा ने उसे बंदीगृह में डाल दिया और उसे यातनाएं दी गईं। बाद में उसे नगरी से ही बाहर कर दिया गया। वहां से वह जंगल में चला गया और वन्यप्राणियों का शिकार कर खाने लगा। फिर वह बहेलिया बन गया और तीर-कमान से पशु-पक्षियों को मारने लगा। एक दिन भूख से तड़पता हुआ वह कौण्डिन्य ऋषि की कुटिया में पहुंच गया। उस वक्त ऋषि मुनि गंगा स्नान करके आए थे। उनके वस़्त्रों से गंगाजल के कुछ छींटे उस पर पड़ गए, जिससे उसका व्यवहार बदल गया। वह ऋषिवर को प्रणाम कर बोला कि हे मुनि! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किए हैं। आप इन पापों से मुक्ति का उपाय बता दीजिए। पापी के दीन वचन सुनकर मुनिश्री ने कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत रखो। व्रत के प्रभाव से मेरू पर्वत जैसे समस्त महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।
मुनिश्री की आज्ञा का पालन करते हुए उसने विधि-विधान से व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उनके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को चला गया। इस व्रत के प्रभाव से मानव के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हिंदू धर्म में इस एकादशी से श्रेष्ठ कोई दूसरा व्रत नहीं है। इसके महात्मय को पढ़ने और सुनने से हजारों गौदान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

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