नई दिल्ली
ईरान और भारत की दोस्ती से दुनिया वाकिफ है. मुश्किल घड़ी में अक्सर भारत अपने दोस्तों का साथ देता है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. पश्चिम देशों ने शुक्रवार को ईरान को यूएन में फंसााया. ऐसे में भारत से देखा नहीं गया. भारत ने डंके की चोट पर ईरान का साथ दिया. दरअसल, हुआ कुछ यूं कि यूएनएचआरसी यानी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में ईरान की मानवाधिकार उल्लंघनों पर एक बड़ा विवाद हुआ. शुक्रवार को यूएनएचआरसी ने ईरान की निंदा की और हाल के विरोध प्रदर्शनों पर क्रूर कार्रवाई की जांच का आदेश दिया. यह जांच हजारों लोगों की मौतों से जुड़ी है. ईरान इस मुद्दे पर बुरी तरह फंस गया था. पश्चिमी देश और नाटो सदस्य जैसे अमेरिका, फ्रांस और दक्षिण कोरिया ईरान के खिलाफ थे. वे सख्त कार्रवाई चाहते थे. लेकिन भारत ने डंके की चोट पर ईरान का साथ दिया.
जी हां, भारत ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया. इससे पश्चिमी देश भौंचक्के रह गए. वे सोच भी नहीं पाए कि भारत जैसे बड़ा लोकतांत्रिक देश ईरान के पक्ष में खड़ा होगा. भारत का यह कदम ईरान के लिए मजबूत समर्थन था. भारत ने साफ कर दिया कि वह ईरान के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ है. इससे भारत की विदेश नीति की ताकत दिखी, जो संतुलित और स्वतंत्र है. पश्चिमी देशों को लगा कि वे आसानी से ईरान को अलग-थलग कर लेंगे, लेकिन भारत के वोट ने उनके प्लान पर पानी फेर दिया. भारत की तरह ही चीन ने भी ईरान का साथ दिया है.
आखिर हुआ क्या?
दरअसल, यह पूरी घटना जेनेवा में UNHRC की इमरजेंसी मीटिंग में हुई. यूएन की इस बॉडी ने ईरान के खिलाफ एक प्रस्ताव पास किया. यह 2022 में शुरू हुई जांच को बढ़ाने का था. अब UN जांचकर्ता हाल के दंगों की भी जांच करेंगे. यह जांच भविष्य में कानूनी कार्रवाई के लिए दस्तावेज तैयार करेगी. अधिकार समूहों का कहना है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह सबसे बड़ा क्रैकडाउन था. इसमें आम नागरिक भी मारे गए. हालांकि, तेहरान सरकार ने इसे आतंकवादियों और दंगाइयों का काम बताया. उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल जैसे विदेशी दुश्मन इसके पीछे हैं. ईरान के यूएन मिशन ने इस प्रस्ताव की निंदा की. ईरान ने कहा कि वह बाहरी हस्तक्षेप नहीं सहन करेगा.
बैठक में क्या हुआ?
चीन, पाकिस्तान, क्यूबा और इथियोपिया जैसे देशों ने बैठक की उपयोगिता पर सवाल उठाया. चीन के राजदूत जिया गाइड ने कहा कि ईरान का दंगा आंतरिक मामला है. जांच के खर्च पर भी सवाल है. यूए में फंडिंग संकट है, जिससे अन्य जांचें रुकी हैं. यह स्पष्ट नहीं कि इस जांच का पैसा कौन देगा. इसके बाद बात अब वोटिंग की थी. इसमें कुल 46 देशों ने वोट किया. प्रस्ताव ईरान के खिलाफ था, यानी जांच बढ़ाने के पक्ष में. ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के पक्ष में 25 वोट पड़े और विपक्ष में 7. 14 देशों ने वोटिंग से दूर रहने का फैसला किया.
ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के पक्ष में कौन-कौन देश: फ्रांस, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, नीदरलैंड्स, स्पेन, इटली, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, आयरलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, चेक गणराज्य, लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया. ये सभी पश्चिमी और नाटो देश हैं.
प्रस्ताव के खिलाफ में कौन-कौन: भारत, चीन, पाकिस्तान, क्यूबा, इथियोपिया, वेनेजुएला, बोलीविया. ये देश ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के खिलाफ हैं.
वोटिंग से दूर कौन-कौन रहे: ब्राजील, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, तुर्की, मिस्र, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश, थाईलैंड, फिलीपींस. ये देश तटस्थ रहे, न पक्ष में न विरोध में.
भारत का साथ क्यों अहम?
ईरान पर यह वोटिंग दिखाती है कि दुनिया कितनी बंटी हुई है. पश्चिमी देश ईरान पर दबाव बनाना चाहते हैं. लेकिन भारत और चीन जैसे बड़े देशों ने ईरान का साथ दिया. भारत का वोट अहम था क्योंकि भारत ईरान से तेल आयात करता है और दोनों के बीच पुराने संबंध हैं. इससे भारत की नीति साफ हुई कि वह मानवाधिकार के नाम पर राजनीति नहीं होने देगा. ईरान में विरोध प्रदर्शन महिला अधिकारों से शुरू हुए थे. एक महिला महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत से भड़के. अब यह पूरे देश में फैल गया. हजारों गिरफ्तार हुए. महिलाएं हिजाब उतारकर विरोध कर रही हैं. सरकार ने इंटरनेट बंद किया और बल प्रयोग किया. अधिकार समूहों का कहना है कि मौतों की संख्या और बढ़ सकती है. बहरहाल, UN की जांच से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन ईरान इसे मानने से इनकार कर रहा है.
Dainik Aam Sabha