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देश में सोयाबीन की उत्पादकता बढ़ाना वैज्ञानिकों के समक्ष बड़ी चुनौती

* कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर में सोयाबीन समूह की वार्षिक बैठक प्रारंभ

आम सभा, ग्वालियर।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर में भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान द्वारा बहु उपयोगी फसल सोयाबीन वैज्ञानिकों की 53वी वार्षिक समूह बैठक में देश भर से आए हुए वैज्ञानिकों ने आज इस फसल के उत्पादन में वृद्धि से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर महत्वपूर्ण चर्चा की। कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित इस दो दिवसीय बैठक में देशभर के 100 से अधिक वैज्ञानिक तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारी गण भाग ले रहे हैं। दिन भर चले सत्रों में वैज्ञानिकों ने इस फसल पर विगत वर्ष में हुए अनुसंधान के निष्कर्षों पर चर्चा की।
दोपहर में समूह बैठक के औपचारिक उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रुप में बोलते हुए राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर अरविंद कुमार शुक्ला ने कहा कि 10 वर्षों से सोयाबीन की उत्पादकता में वृद्धि नहीं हो पाना वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है। वैज्ञानिकों को ऐसी किस्में तैयार करनी होंगी जो जलवायु परिवर्तन, बीमारियों के प्रति सशक्त प्रतिरोधक हो। प्रो. शुक्ला ने कहा कि यह फसल कुपोषण निवारण में उपयोगी होने के साथ-साथ किसानों की आर्थिक दशा सुधारने में बहुत उपयोगी हो सकती है। किसानों द्वारा एफपीओ का गठन कर बाजार में इसकी अच्छी कीमत प्राप्त की जा सकती है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक फसल डॉ. तिलक राज शर्मा ने कहा कि सोयाबीन विश्व में सबसे बड़ी तिलहन फसल है साथ ही इसका पशु आहार के रूप में भी बहुत बड़ा उपयोग है। सोयाबीन उगाने वाले विभिन्न राज्यों के किसानों के बीच सोयाबीन किस्मों की विविधता और जलवायु-लचीला, उच्च उपज देने वाली सोयाबीन किस्मों को बढ़ावा देने इसके आनुवांशिक आधार को व्यापक बनाने पर जोर देना होगा।
डॉ. संजीव गुप्ता, एडीजी (तिलहन और दलहन), भाकृअनुप ने देश की वनस्पति तेल की मांग में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए सोयाबीन उत्पादकता बढ़ाने के लिए नीति निर्माताओं की अपेक्षा को रेखांकित किया। डॉ. गुप्ता ने कहा कि सोयाबीन देश के नए-नए क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने पर काम किया जा रहा है। वर्तमान स्थिति में, सोयाबीन बीज प्रतिस्थापन की दर अन्य फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है और उन्होंने स्थान-विशिष्ट नई किस्मों को लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
परियोजना निदेशक डॉ. के.एच. सिंह ने सोयाबीन परियोजना के अंतर्गत चल रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी देते हुए बताया कि सोयाबीन से 300 से अधिक केमिकल प्राप्त किए जा सकते हैं। भारत इसका पांचवा सबसे बड़ा उत्पादक देश होते हुए भी उत्पादकता में बहुत पीछे होना हमारे लिए एक चुनौती है।
प्रारंभ में विश्वविद्यालय की ओर से संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. संजय कुमार शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया। सत्र के अंत में आभार प्रदर्शन डॉ. संजय गुप्ता प्रधान वैज्ञानिक सोयाबीन द्वारा तथा संचालन डॉक्टर वाय. डी. मिश्रा ने किया।
सत्र में विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता कृषि संकाय डॉ. डी.एच. रानडे, निदेशक शिक्षण एवं छात्र कल्याण डॉ. एस. पी. एस. तोमर, निदेशक विस्तार सेवायें डॉ. वाय. पी. सिंह, कुलसचिव श्री अनिल सक्सेना एवं अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय ग्वालियर डॉ. सुरेंद्र सिंह तोमर सहित विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक गण उपस्थित थे।

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