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यूनानी चिकित्सा पद्धति आज भी जिंदा है

हिंदुस्तान में जिस ढंग से आयुर्वेद पल्लवित हुआ ठीक उसी तर्ज पर अरब में यूनानी चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ अनेक विद्वानों का कहना है कि यूनानी चिकित्सा पद्धति भी आयुर्वेद की ही देन है और उसमें भी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का भरपूर उपयोग किया जाता है। यह कड़वा सच है कि हिंदुस्तान जैसे ही अंग्रेजों का गुलाम बना तो अंग्रेजों ने सबसे पहले आयुर्वेद को नेस्तनाबूद करने के लिए आयुर्वेद के अति दुर्लभ ग्रंथों को विदेश में भिजवा दिया था। उसी से यूनानी तिब्ब का उदय हुआ। हालांकि यूनानी चिकित्सा पद्धति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद हैं। हकीम अब्दुल लतीफ़ फल्की और हकीम गुलाम जिलानी यूनानी चिकित्सा पद्धति कि जन्म स्थली हिंदुस्तान को ही मानते है ।

हकीकत जो भी हो लेकिन इसमें कोई मतभेद नहीं है कि यूनान में इस पद्धति की तरक्की हुई और दर्जनों पुस्तकें लिखी गई हकीम बुकरात ने यूनानी चिकित्सा पद्धति पर तमाम सारी पुस्तकें लिखी और उनके शिष्यों ने भी इस कार्य को गति दी कई अन्य अध्ययनों से भी यह बात सामने आई है कि हकीम जालीनूस के समय में यूनानी चिकित्सा पद्धति की जड़े मजबूत हुई। इस दौरान तमाम सारे अनुसंधान भी हुए जिससे यूनानी चिकित्सा पद्धति की जड़ें और मजबूत हुई तथा अनेक अनुसंधान भी हुए। यह पद्धति चीन मिस्र काबुल आदि देशों में काफी फली फूली इसके बाद इस पद्धति की इस्लामिक देशों और अरब में आई यहाँ यह जकारिया राजी शेख अबू अली बिन सीना की वजह से खूब फली फूली शेख साहब जैसी शख्सियत की लिखी पुस्तकें इतनी प्रसिद्ध हुई कि इन्हें 18वीं सदी में यूरोप की शैक्षणिक संस्थाओं तक में पढ़ाए जाने लगा। इसके पश्चात यह पद्धति ईरान से होती हुई हिंदुस्तान में वापस लौटी और पुनः यहीं की होकर रह गई।

मुगलों के कार्यकाल में इस पद्धति का डंका पूरे हिंदुस्तान में बजने लगा । हजारों पुस्तकें अरबी और पश्तो भाषा में लिखी गई हिंदुस्तान में जब ब्रिटिश हुकूमत ने राज किया तो इस पद्धति को भी नेस्तनाबूद करने के प्रयास किए गए लेकिन चूंकि इन पद्धितीयों की जड़ें गहरी थी यह आम जनता के मध्य लोकप्रिय थी इसलिए यह पूरी तरह नेस्तनाबूद नहीं हो सकी इसलिए दिल्ली में शरीफी खानदान तथा लखनऊ में अजीजी खानदानों ने इसके विकास के लिए संस्थानों की नींव डाली।

बुक रात और जालीनूस का कहना था कि जो आदमी जिस मुल्क का रहने वाला है उसको उस देश की ही जड़ी बूटियों से फायदा पहुंच सकता है। आयुर्वेद में भी इसी तरह की बात कही गई है। यूनानी चिकित्सा पद्धति की बुनियाद अनासिर अखलात और मिजाज पर निर्भर है। चार अनासिर यानि आग पानी हवा और मिट्टी जिससे दुनिया की हर चीज बनी है। इसी तरह चार अखलात यानि खून सफारा बलगम (श्लेष्मा) और सौदा।

इसके खास अनुपात में मनुष्य के बदन में मौजूद रहने पर ही उसका स्वास्थ कायम रहता है और जब इस में अंतर आता है तो मनुष्य बीमार पड़ जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक आदमी का खास मिजाज होता है। जब वह मिजाज किसी कारण से बदल जाता है तो बीमारी उत्पन्न होती है इस प्रकार जब आदमी के अंदर विकार आया अनुपात या मिजाज में बिगाड़ पैदा होता है । तो आदमी बीमार पड़ता है तो आदमी ने जिस चीज की कमी या बढ़ोत्तरी देखी जाती है तो उसी को चिकित्सा की बुनियाद बनाया जाता है। इसी प्रकार जड़ी बूटियों में भी मिजाज माना जाता है। यानी कुछ औषधियां गर्म तासीर वाली होती है तो कुछ ठंडी तासीर वाले ये दोनों ही या तो तर होती है या खुश्क अगर किसी आदमी में गर्मी बढ़ गई है तो उसे ऐसी दवा देंगे जो गर्मी कम करने वाली होगी या किसी में अगर पित्त बढ़ गया है तो उसे ऐसी दवा देंगे जो उसे तत्काल कम करें इन्हीं आधारों पर यूनानी पद्धति में उपचार किया जाता है।

यूनानी पद्धति प्रारंभ से ही आम जनता में काफी लोकप्रिय रही है लेकिन चूंकि यूनानी भाषा में से यह पद्धति अरबी और पश्तो में हस्तांतरित हुई बल्कि यह कहा जाए कि इन भाषाओं में तो और भी वृद्धि हुई लेकिन चूंकि उर्दू में इसका साहित्य उपलब्ध नहीं है उपलब्ध ना नहीं है ना ही हिंदी में इसलिए इस पद्धति के विकास के लिए अरबी और पश्तो से इन भाषाओं के अनुवाद की निहायत आवश्यकता है। इसके साथ ही के तिबतिया कॉलेजों में भी प्राध्यापकों की काफी कमी है कुछ कॉलेजों में तो सिर्फ दो-तीन प्राध्यापक ही पूरा कॉलेज चलाते हैं अतः इस दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। इसलिए आवश्यक है कि हकीम अपनी पद्धति के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हो उपलब्ध साहित्य का उर्दू एवं हिंदी में अनुवाद होना चाहिए। शैक्षणिक संस्थाओं की स्थिति को सुधारना चाहिए। इस पद्धति को अधिकाधिक प्रायोगिक बनाना चाहिए। देसी जड़ी बूटियों की अपने ही मुल्क में पैदावार बढ़ाई जाए तथा नए अनुसंधान केंद्र खोले जाएं । जिससे इन पद्धतियों की अपनी विशिष्टतम औषधियों आम जनता को जनता के हित में सामने आ सके।

लेखक के विषय में मान्यता प्राप्त स्वतंत्रत पत्रकार मुकेश तिवारी

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