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जम्मू-कश्मीर : राष्ट्रपति शासन व आरक्षण संबंधी बिल पर रास की भी मुहर

नई दिल्ली : 

जम्मू-कश्मीर के हर हिस्से के विकास के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता जताते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्य में ‘आतंकवाद व अलगाववाद’ को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. यह भी कहा कि राज्य में विस चुनाव के लिए चुनाव आयोग जब भी तैयार होगा, केंद्र सरकार एक दिन की भी देरी नहीं करेगी. शाह ने सोमवार को जम्मू -कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि तीन जनवरी, 2019 तक बढ़ाने संबंधी संकल्प और जम्मू-कश्मीर आरक्षण विधेयक (संशोधन) विधेयक 2019 पर एक साथ हुई चर्चा के जवाब में राज्यसभा में यह बात कही.

उनके जवाब के बाद सदन ने इस संकल्प और विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया. लोकसभा इन्हें पहले ही पारित कर चुकी है. सरकार के लिए अच्छी बात यह रही कि राज्यसभा में पर्याप्त संख्या बल न होने पर भी इस विधेयक के पास होने में समस्या नहीं हुई. बीजद और सपा ने सरकार के प्रस्ताव का एक तरह से खुल कर समर्थन किया.

नयी सोच से ही कश्मीर समस्या का समाधान : शाह ने स्पष्ट किया कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए हमें नयी सोच अपनाने की जरूरत है. मोदी सरकार जम्मू, कश्मीर व लद्दाख के ‘सम विकास’ के लक्ष्य के लिए काम रही है.सवाल किया कि सूफी परंपरा क्या कश्मीरियत का अंग नहीं था? कश्मीरी पंडितों को घर से निकाल दिया गया. क्या वे कश्मीरियत का हिस्सा नहीं हैं. हिंदू-मुस्लिमों की एकता की बात करने वाले सूफी संतों को एक-एक कर मार दिया गया. उनकी बात क्यों नहीं की जा रही? एक दिन आयेगा जब मां खीरभवानी के मंदिर में कश्मीरी पंडित पूजा करेंगे और सूफी संत भी दिखायी देंगे.

तीन परिवारों तक ही सीमित न रहे राज्य में लोकतंत्र
शाह ने कहा कि हमारा रूख साफ है, जो देश को तोड़ने की बात करेंगे, हम उसे उसी की भाषा में जवाब देंगे. जम्मू -कश्मीर में लोकतंत्र सिर्फ तीन परिवारों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए.राज्य में राष्ट्रपति शासन संबंधी विपक्षी दलों के सवाल पर शाह ने कहा कि हम इस धारणा से सहमत हैं कि अनुच्छेद 356 का उपयोग कम से कम होना चाहिए. सच तो यह है कि कांग्रेस की सरकारों ने इसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया है. उन्होंने कहा कि लोकसभा के साथ राज्य विधानसभा चुनाव इसलिए नहीं कराया गया कि सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह से तैयार नहीं थीं.

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