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ममता बनर्जी को बड़ा झटका! TMC सांसद काकोली घोष ने सभी संगठनात्मक पदों से दिया इस्तीफा

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है. अब पार्टी को बड़ा झटका लगा है. बारासात से TMC पार्टी की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने संगठन में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. पिछले कुछ समय से उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद की खबरें आ रही थीं, जिस पर अब इस इस्तीफे ने मुहर लगा दी है।

प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेजा पत्र
सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपना इस्तीफा तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेज दिया है. अपने पत्र में उन्होंने साफ किया है कि वह पार्टी संगठन के सभी पदों को छोड़ रही हैं. बता दें कि इससे पहले उन्होंने बारासात के जिलाध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह कोई बड़ा कदम उठा सकती हैं।

सांसद बनी रहेंगी काकोली घोष
हालांकि, काकोली घोष ने अभी तक तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है. वह लोकसभा में बारासात सीट से टीएमसी की सांसद बनी रहेंगी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका यह कदम पार्टी नेतृत्व को एक कड़ा संदेश है, जिससे यह साफ है कि वह संगठन के कामकाज के तरीके से खुश नहीं हैं।

पार्टी में बढ़ता असंतोष ममता के लिए चिंता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी के अंदर कई सांसद और विधायक नाराज चल रहे हैं. काकोली घोष जैसी सीनियर नेता का इस तरह पदों से किनारा करना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी चिंता का विषय बन सकता है. फिलहाल इस पूरे मामले पर टीएमसी आलाकमान की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

ममता बनर्जी के इस कदम से काकोली घोष आहत और नाराज चल रही हैं. काकोली घोष ने सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. काकोली घोष को टीएमसी के चीफ व्हिप से हटाए जाने के कुछ ही घंटों में केंद्र सरकार ने उनको वाई सिक्योरिटी दे दी थी. ऐसा तब था, जब अभिषेक बनर्जी से लेकर टीएमसी के तमाम नेताओं की सिक्योरिटी में कटौती की गई थी।

एक दिन पहले ही काकोली घोष टीएमसी के छह विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में भी शामिल हुई थीं. काकोली घोष टीएमसी की स्थापना के पहले से ममता बनर्जी की करीबी रही हैं।

I PAC को मैनर्स नहीं, बदतमीजी से बात करते थे
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी संगठन, चुनावी हार, आई-पैक की भूमिका और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि वह पिछले 40 वर्षों से पार्टी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब पार्टी सत्ता में नहीं थी और कार्यकर्ताओं को सड़कों पर प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन कुछ लोग बाहर से आकर पार्टी को नुकसान पहुंचा गए।

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उन्होंने पार्टी के कठिन समय में संघर्ष किया और मेहनत के दम पर संगठन को मजबूत बनाने में योगदान दिया। मैं अच्छे समय में पार्टी में नहीं आई थी। जब लोग सड़कों पर पीटे जाते थे, तब भी मैं पार्टी के साथ थी। हमने लंबे संघर्ष के बाद पार्टी को मजबूत किया और करीब 20 साल बाद सत्ता हासिल की।

व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी में आए कुछ लोग
काकोली घोष ने इशारों में उन नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी निशाना साधा, जो पार्टी के सत्ता में आने के बाद जुड़े। उनके अनुसार, ऐसे कई लोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति में आए। उन्होंने संगठन को मजबूत करने में कोई विशेष योगदान नहीं दिया। बंगालविधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार और चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी आई-पैक की भूमिका पर काकोली घोष दस्तीदार ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एजेंसी का काम करने का तरीका गलत था और उसके प्रतिनिधियों का व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति अपमानजनक था।

ममता बनर्जी के नौकर नहीं टीएमसी कार्यकर्ता
काकोली ने कहा कि हमारे कार्यकर्ता किसी के नौकर नहीं हैं। वे ममता बनर्जी और पार्टी के प्रति प्रेम और विश्वास के कारण काम करते हैं, लेकिन आई-पैक के लोगों ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया, जिससे कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी। उन्होंने यह भी कहा कि एजेंसी के कुछ सदस्य खुद को बहुत बड़ी सत्ता मानने लगे थे और स्थानीय नेताओं की राय को महत्व नहीं देते थे। उनके अनुसार, चुनाव प्रचार का संचालन करने वाली इस बाहरी एजेंसी के पास जमीनी राजनीति का पर्याप्त अनुभव नहीं था, जबकि पार्टी कार्यकर्ता लंबे समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं।

I-PAC में काम करने का बिल्कुल भी सलीका नहीं था। वे बहुत ही बदतमीज़ी से बात करते थे। हमारे ये कार्यकर्ता कोई नौकर नहीं हैं। हम इन्हें कोई तनख्वाह नहीं देते। ये तो ममता दीदी और पार्टी के प्रति अपने प्यार की वजह से काम करते हैं। वे लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते थे, और उनका घमंड इतना बढ़ गया था कि आखिरकार उन्होंने हमारे साथ भी बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। उन्हें ऐसा लगता था मानो वे प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा ऊंचे ओहदे पर बैठे हों। मुझे नहीं लगता कि I-PAC सीधे तौर पर उनके (ममता बनर्जी के) नियंत्रण में था, क्योंकि I-PAC एक अलग ही संस्था है।