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बीड़ी बनाने वाले 7000 कुल श्रामिको ने मध्य प्रदेश के सतना, टीकमगढ़, कटनी, सागर, दमोह, छत्तरपुर, बंडा, बीना क्षेत्रों में निकाली 14 रैलियाँ

– 4000 बीड़ी बनाने वाली गृहिणियों ने की सरकार से विनती

भोपाल : भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 1-1-2021 को सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद (विज्ञापन और व्यापार और वाणिज्य का विनियमन, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का प्रतिषेध) अधिनियम, 2003 (COTPA) की मौजूदा कठोर नियमावली में और भी अधिक कठोर संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं । अगर ये प्रस्तावित संशोधन क़ानून मैं बदलते हैं, तो 200 वर्ष पुराना “हस्तनिर्मित, सम्पूर्ण स्वदेशी” बीड़ी का कुटीर उद्योग रातों-रात समाप्त होने की स्तिथि में आ जाएगा। इन संशोधनों के कुछ मुख्य मुद्दे, जिनका नकारात्मक प्रभाव बीड़ी उद्योग से जुड़े लगभग तीन करोड़ कामगारों पर पड़ेगा, इस प्रकार हैं :

· बीड़ी के बंडल पैकेट पर ब्रांड का नाम छापने की मनाही

· बीड़ी के बंडल पैक में सरकार द्वारा निर्धारित की गयी बीड़ी की संख्या

· बीड़ी की बिक्री और व्यापार के लिए दुकानदार से लेकर छोटे से छोटे ग्रामीण रेडी और फेरी वालों तक को, सरकार से विशेष ट्रेड लाइसेन्स लेना अनिवार्य होगा

· हस्त-निर्मित बीड़ी के हाथ से बाँधे गए, शंक्वाकार छोटे से बंडल पर भी निर्माण की तारीख़ और बीड़ी का मूल्य छापना पड़ेगा

· विज्ञापन के लिए मौजूदा कठोर प्रतिबंध के ऊपर और भी सख़्त प्रतिबन्ध प्रस्तावित, जैसे कि दुकान या गोदाम पर बीड़ी सम्बन्धी सूचना पट्ट लगाना वर्जित, बीड़ी के ब्रांड या नाम से अन्य किसी प्रकार का उत्पाद और उसकी बिक्री वर्जित, इत्यादि

· नियमों का पालन नहीं करने पर कारावास जैसे अति कठोर दंड और सबसे उच्च कोटि का जुर्माना प्रस्तावित

इन प्रवधानो का निष्ठा से पालन करना, विशेष रूप से पूर्णतः हस्तनिर्मित कुटीर उद्योग के लिए, असम्भव है। COTPA 2003 के नए प्रस्तावित संशोधन बीड़ी उद्योग की समाप्ति का और इस उद्योग से जुड़े तीन करोड़ से अधिक श्रमिकों की बेरोज़गारी का कारण बन सकते हैं। बीड़ी बनाने के काम में 85 लाख कारीग़र जुड़े है, जिनमें से महिलाओं की संख्या 65 लाख है। ये महिला श्रमिक घर बैठे बीड़ी बनाकर अपनी आजीविका अर्जित करती हैं, अपने परिवारों का पालन-पोषण इसी रोजगार से करती हैं। तेंदू पत्ता तोड़ने में 70 लाख औरतें और आदिवासी जुड़े है। बीड़ी के तम्बाकू के उत्पादन में 30-40 लाख से अधिक किसान और श्रमिक जुड़े है। 75 लाख छोटे दुकानदार देहातों में बीड़ी की बिक्री करके रोज़गार कमाते हैं। इस प्रस्तावित संशोधन के क़ानून बन कर लागू होने के बाद बीड़ी की बिक्री सबसे अधिक घटेगी, मशीन निर्मित सिगरेट और चबाने की तम्बाकू से कहीं ज़्यादा, जो इस तरह का रोजगार नहीं देते हैं और न दे सकते हैं।

COTPA में प्रस्तावित संशोधन के तहत बीड़ी की बिक्री घटने पर बीड़ी श्रमिकों के रोज़गार पर बहुत गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ध्यान रखने की बात यह भी है कि महिलाएँ गृहणी का कर्तव्य निभाते हुए, घर बैठ के ही अपनी स्वेच्छा से यह काम करती हैं और आत्मानिर्भर भारत का प्रतीक हैं। इन 65 लाख पंजीकृत बीड़ी महिला श्रमिकों को आज हाल में इस तरह का कोई भी घर बैठे आमदनी का साधन देनेवाला कुशल कार्य नहीं आता है। यह हस्तकौशल से बना, रोज़गार देने वाला उत्पाद इन महिला श्रमिकों के लिए वर्षों से स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार के लिए बीड़ी से जुड़े करोड़ों श्रमिकों का,ख्याल करना उचित रहेगा। सरकार को बीड़ी श्रमिकों के रोज़गार, बीड़ी उद्योग पर लागू होने वाले क़ानून और लोक स्वास्थ्य, इन तीनों मुद्दों पर संतुलित विचार करना उचित और आवश्यक है।

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